* * * पटना के पैरा-मेडिकल संस्थान नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एजुकेशन एंड रिसर्च जयपुर कें निम्स यूनिवर्सिटी द्वारा अधिकृत कएल गेल। *

Saturday 13 February 2010

हिंदी आ उल्फा

प्रतिबंधित संगठन उल्फा जखन-जखन कमजोर भेल अछि,हिंदी आ हिंदीभाषीलोकनि पर बंदूक तनने अछि। उल्फा के विचार छैक जे हिंदी भारतीय शासकवर्गक भाषा छैक। उल्फा एक बेर फेर असम में हिंदी पर बंदूक तानि देने अछि। उल्फा प्रमुख परेश बरुआ अपन कैडर कें असम में हिंदी कें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूपें प्रोत्साहित करनिहार कें सावधान कएलक अछि। बरूआ के कहब छैक जे, जे गोटे असम में हिंदी कें प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूपें से प्रोत्साहित करबा में लागल छथि,तनिका पहिल बेर चेतावनी देल जाएत आ जं ओहि सं नहि मानताह तं दोसर बेर "आवश्यक कार्रवाई" कएल जाएत। उल्फा कें "आवश्यक कार्रवाई" कें मतलब छैक गोली मारब। हिंदी के खिलाफ उल्फा कें ई कोनो पहिल आ अंतिम बयान नहिं छैक।

प्रायः, हिंदीभाषी पर किछु दिन तक लगातार हमला करबाक बाद उल्फा अचानक चुप्पी साधि लैत छैक। जहिना मामला ठंडाएल कि फेर हमला तेज । मुदा एहि बेर हिंदी भाषा पर सीधे हमला करबाक बजाय उल्फा हिंदी फिल्मक सहारा लेने अछि। उल्फा के कहब छैक जे कामोत्तेजक दृश्य वला हिंदी फिल्म आ वीडियो सीडी के कारणे असम कें सांस्कृतिक वातावरण प्रदूषित भ रहल छैक। एहि कारणें ग्लैमरस आ कामोत्तेजक दृश्यविहीन असमिया आ आन स्थानीय भाषा सभहक फिल्मक बाजार खत्म भ गेल छैक। एहि सं स्थानीय भाषा में सिनेमा निर्माण आ प्रसार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ल अछि। उल्फा मणिपुर में हिंदी फिल्म, सीडी, वीसीडी, टेलीविजन चैनल पर लागल प्रतिबंधक समर्थन कएने अछि।

असम में उल्फा के आतंकक एक दौर एहनो छल,जखन लोग सिटी बस आर सार्वजनिक स्थान पर हिंदी बजबा सं डरैत छल मुदा आब हालात बदलल छैक। असम के लोग हिंदी बूझए आ बाजए छथि। हुनका हिंदी भाषा सं कोनो विरोध नहिं छन्हि। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के करीब दू सए हिंदी केंद्र असम में चलि रहल छैक आ ओहि में सं अधिकांश केर संचालक असमियालोकनि छथि। स्कूल आर कॉलेज में हिंदी पढ़ओनिहार बेसी शिक्षक असमिया छथि। सत्य इएह छैक जे असम में हिंदी का विस्तार पछिला किछु बरख में तेजी सं भेल छैक। असम सं बाहर जएबाक इच्छुक असमिया छात्र स्कूल में हिंदी कें एक विषय के रूप में स्वीकार क रहल छथि। आब उल्फा सेहो कमजोर पड़ि चुकल अछि, तें उल्फा के ताजा धमकी कें कोनो असमिया गंभीरता सं नहिं ल रहल अछि।
(नई दुनिया,दिल्ली,13.2.10 में प्रकाशित रविशंकर रवि के आलेख पर आधारित)

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