* * * पटना के पैरा-मेडिकल संस्थान नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एजुकेशन एंड रिसर्च जयपुर कें निम्स यूनिवर्सिटी द्वारा अधिकृत कएल गेल। *

Friday, 15 January, 2010

स्कूली बस्ता के अधिकतम वजन छह किलो तय

केंद्रीय विद्यालय संगठन (केवीएस) की उस पहल का देशभर में स्वागत होना चाहिए, जिसमें उसने स्कूली बच्चों की चिंता करते हुए बस्तों के वजन का मुद्दा पुन:उठाया है। केवीएस के अनुसार बस्तों का अधिकतम वजन छह किलो होना चाहिए और संगठन ने अपने सभी विद्यालयों को परिपत्र जारी करके इसे सुनिश्चित करने को कहा है। वजनदार बस्ते उठाने से बच्चों पर शारीरिक और मानसिक बोझ पड़ता है, यह बात नई नहीं है। बदलते पाठ्यक्रमों, पढ़ाई के नए-नए तरीकों और अनावश्यक विषयों को पढ़ाने के चलते भारी-भरकम बस्ते उठाने को बच्चे अभिशप्त रहे हैं। वर्षो पूर्व एक सरकारी आदेश के बाद बने आयोग ने इस बारे में चिंता जताई थी। प्रो.यशपाल कमेटी की सिफारिशों के बहाने स्कूली बस्तों का वजन कम करने की चर्चा देश में शुरू हुई थी,लेकिन जल्द ही वह थम भी गई। न सरकार ने कुछ किया और न शिक्षाविदों व विद्यालय के प्रबंधकों ने इस विषय की गंभीरता को समझकर बच्चों के हित में सोचा। प्रो. यशपाल की अनुशंसाएं सरकारी दफ्तरों में धूल खाती रहीं और बच्चे बोझ उठाते रहे। इस बीच सरकारी स्कूलों के साथ-साथ निजी क्षेत्र में स्कूल खुले,लेकिन कुछ नामचीन स्कूलों को छोड़कर अन्य निजी स्कूलों से बहुत अपेक्षाएं करना ठीक भी नहीं था। स्कूल में क्या पढ़ाना चाहिए, अनावश्यक विषयों पर रोक लगनी चाहिए, बच्चों को सारी किताबें, नोट-बुक्स रोज स्कूल में लाना-ले जाना गैर-जरूरी किया जाना चाहिए, किताबांे के अलावा मैदानी, प्रयोगात्मक व अन्य माध्यमों से भी बच्चों को शिक्षित करना चाहिए इत्यादि पर विभिन्न फोरमों पर बहस होने के बावजूद नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा और नौनिहालों का ध्यान किसी ने नहीं रखा। लेकिन अब केंद्रीय विद्यालय संगठन का नया आदेश इस दिशा में एक ठोस कदम है। सरकार को चाहिए कि इसे सिर्फ केवीएस के विद्यालयों तक सीमित न रखकर मिशनरी और निजी स्कूलों में भी अनिवार्य करे। अब समय आ गया है कि इस देशव्यापी समस्या पर वैज्ञानिक तौर-तरीकों से चर्चा हो और बस्तों का वजन हर हाल में कम से कम रखने पर आम सहमति बने। इस मामले में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय चाहे तो पक्के और कठोर कानून बनवाए, जिससे बच्चों को इस शारीरिक और मानसिक बोझ से हमेशा के लिए मुक्ति दिलवाई जा सके। नए वर्ष के प्रारंभ में यह पहल होनी ही चाहिए।
(दैनिक भास्कर,दिल्ली,16.1.10 का संपादकीय)


(नई दुनिया,दिल्ली,15.1.10)

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